
सोशल मीडिया का दौर है। यहां जो दिखता है, वही ट्रेंड करता है और जो ट्रेंड करता है, वही चर्चा में रहता है। शायद यही वजह है कि अब बड़े-बड़े नेता भी इंस्टाग्राम, रील्स और स्टोरी के जरिए युवाओं तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। इसी कड़ी में राहुल गांधी ने भी इंस्टाग्राम पर ‘Ask Me Anything’ सेशन शुरू कर दिया है। उन्होंने छात्रों और जेन-जी से कहा कि वे उनसे कोई भी सवाल पूछ सकते हैं और वे ज्यादा से ज्यादा सवालों के जवाब देने की कोशिश करेंगे।
सुनने में यह पहल अच्छी लगती है। आखिर जनता से सीधा संवाद होना भी चाहिए। लेकिन सोशल मीडिया की जनता इतनी भोली नहीं है कि हर नई पहल पर बिना सवाल किए तालियां बजा दे। यहां लोग पहले पोस्ट देखते हैं, फिर कमेंट पढ़ते हैं और उसके बाद मीम बनाना शुरू कर देते हैं।
सोशल मीडिया पर एक धारणा अक्सर देखने को मिलती है कि अगर राहुल गांधी को कोई तीखा या असहज सवाल पूछा जाए, तो वह सवाल पूछने वाले को तुरंत “बीजेपी एजेंट”, “आईटी सेल” या “प्रोपेगेंडा” का हिस्सा बता देते है। यही वजह है कि ‘Ask Me Anything’ की घोषणा के बाद कई यूजर्स मजाक में कहने लगे—”सवाल पूछेंगे, लेकिन पहले यह तय कर लें कि जवाब मिलेगा या एजेंट का सर्टिफिकेट।”
हालांकि, किसी भी सार्वजनिक संवाद की असली परीक्षा यही होती है कि आसान सवालों के साथ-साथ कठिन और असहज सवालों का भी जवाब दिया जाए। तभी “Ask Me Anything” का मतलब सचमुच “कुछ भी पूछिए” माना जाएगा, न कि “वही पूछिए जो पसंद आए।”
युवा भी अब सिर्फ बड़े-बड़े वादों या आकर्षक वीडियो से प्रभावित नहीं होते। उन्हें जवाब चाहिए, स्पष्टता चाहिए और सबसे बढ़कर निरंतर संवाद चाहिए। एक दिन का सेशन या कुछ स्टोरी पोस्ट कर देने भर से भरोसा नहीं बनता। भरोसा तब बनता है, जब सवाल कठिन हों और जवाब उनसे भी ज्यादा ईमानदार।
फिलहाल इतना तय है कि नेताओं ने समझ लिया है कि आज की पीढ़ी तक पहुंचने का रास्ता अब सिर्फ भाषणों से नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन से होकर गुजरता है। अब देखना यह है कि यह “Ask Me Anything” सच में खुला संवाद बनता है या फिर कुछ चुने हुए सवालों तक ही सीमित रह जाता है। सोशल मीडिया की जनता इंतजार कर रही है, क्योंकि यहां लाइक और ट्रोल दोनों की स्पीड लगभग बराबर होती है।


