केरलम के सबरीमाला मंदिर सहित अन्य संप्रदायों के धार्मिक स्थलों में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है। आज सुनवाई का 9वां दिन है।
मस्जिद दरगाह में महिलाओं के प्रवेश के खिलाफ दलील दे रहे एडवोकेट निजाम पाशा ने कहा कि कोई व्यक्ति हिजाब को धार्मिक रूप से अनिवार्य मान सकता है, लेकिन स्कूल के नियम अलग हो सकते हैं। मतलब धार्मिक विश्वास हमेशा संस्थागत नियमों से ऊपर नहीं होगा।
अगर किसी मोहल्ले की मस्जिद सबके लिए खुली हो तो भी कोई जाकर घंटी नहीं बजा सकता। आरती नहीं कर सकता, क्योंकि उस जगह की अपनी धार्मिक मर्यादा है। कुरान बहुत संक्षिप्त है। उसमें हर प्रथा डिटेल में नहीं लिखी। पैगंबर की परंपरा भी धार्मिक प्रथा का हिस्सा है। मतलब सिर्फ किताब में लिखा होना ही ‘जरूरी अधिकार’ तय नहीं करता।
23 अप्रैल को पिछली सुनवाई में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने कोर्ट से कहा था कि इस्लाम महिलाओं को नमाज के लिए मस्जिद आने से नहीं रोकता, लेकिन यह बेहतर है कि वे घर पर ही इबादत करें।
सबरीमाला मंदिर मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई शुरू हुई थी। इस दौरान केंद्र सरकार ने महिलाओं की एंट्री के विरोध में दलीलें रखीं। सरकार ने कहा था कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों की एंट्री भी बैन है, इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए।
एडवोकेट कुमार: देवता तय कर सकते हैं कि कौन अंदर जाएगा या नहीं। रस्म का पीरियड्स से कोई लेना-देना नहीं है। 18 स्टेप्स हैं। 5 जजों की बेंच के फैसले के बाद, और जब रेफरेंस दिया गया, तो यह नहीं बताया गया। सिर्फ 2 लोग पुलिस के साथ अंदर गए और 3 और लोगों ने कोशिश की।
इंटरविनर के वकील कृष्णराज कुमार: देवता का सिविल अधिकार- यह माना जाता है कि प्रॉपर्टी देवता की है। सभी रेवेन्यू रिकॉर्ड में इसे सबरीमाला देवस्वामी के तौर पर दर्ज किया गया है। भले ही देवता हमेशा नाबालिग हैं और एक कानूनी व्यक्ति हैं-देवता एक प्राणप्रतिष्ठम हैं। मैंने बताया है कि देवता की हर प्रॉपर्टी में एनर्जी शामिल है। मटीरियल चुनने के बाद, कंक्रीट बनाना शुरू होता है।


