सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को वोटर लिस्ट से बाहर किए गए लोगों से जुड़ी याचिका पर सुनवाई की। कोर्ट ने कहा कि वोटर लिस्ट में से नाम हटने से किसी की नागरिकता नहीं जाती है।
दरअसल सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है, जिसमें मांग की गई है कि बंगाल में जिन लोगों के नाम स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के कारण कट गए हैं उनको सरकारी योजनाओं का लाभ मिलना बंद नहीं होना चाहिए।
साथ ही नागरिकता पर अंतिम फैसला होने तक सभी सुविधाएं मिलती रहनी चाहिए। इस मामले में चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच ने चुनाव आयोग (EC) और पश्चिम बंगाल सरकार को नोटिस भेजकर जवाब मांगा है।
दरअसल बंगाल सरकार ने पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम (PDS) के तहत अन्नपूर्णा योजना जैसी योजनाओं का लाभ उन लोगों को देने से मना करने के लिए नोटिफिकेशन जारी किए हैं जिनका नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया है। दावा किया गया कि उन लोगों को जाति सर्टिफिकेट भी नहीं दिए जा रहे हैं।
पश्चिम बंगाल में SIR की ड्राफ्ट लिस्ट में 58.20 लाख नाम कट गए हैं। ड्राफ्ट लिस्ट से पहले राज्य में 7.66 करोड़ थे, ड्राफ्ट लिस्ट में 7.08 करोड़ वोटर्स का नाम शामिल किया गया।
काटे गए वोटर्स का प्रतिशत 7.6 है, यानी हर 100 से में लगभग 8 वोटर्स का नाम हटाया गया है। हालांकि, 58.20 लाख वोटर्स में से 24.17 लाख मृत पाए गए, 1.38 लाख डुप्लीकेट या फर्जी थे, 32.65 लाख वोटर्स शिफ्ट, लापता और अन्य थे।
चुनाव आयोग ने मतदाता सूची में नाम जुड़वाने वाले नए आवेदकों के लिए भी नया नियम लागू किया है। अब फॉर्म-6 भरकर वोटर लिस्ट में नाम शामिल कराने वाले हर नए वोटर को अपने माता-पिता के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन का ब्योरा भी देना होगा।


